इंजीनियर ने नौकरी छोड़ की हाइब्रिड फलों की खेती:चार बीघा में 50 हजार की लागत; परंपरागत खेती से चार गुना अधिक कमाया मुनाफा

इंजीनियर ने नौकरी छोड़ की हाइब्रिड फलों की खेती:चार बीघा में 50 हजार की लागत; परंपरागत खेती से चार गुना अधिक कमाया मुनाफा

मुरैना जिले के एक युवा इंजीनियर ने नौकरी छोड़कर खेती को अपना भविष्य बनाया और आज हाइब्रिड ऑर्गेनिक फलों की खेती से न सिर्फ आत्मनिर्भर बने हैं, बल्कि अन्य युवाओं के लिए भी प्रेरणा बन गए हैं।

महज चार-पांच वर्षों में उन्होंने यह साबित कर दिया कि यदि आधुनिक तकनीक और सही योजना के साथ खेती की जाए, तो इससे परंपरागत फसलों की तुलना में कई गुना अधिक आमदनी संभव है।

चिन्नौनी करैरा निवासी 30 वर्षीय प्रगतिशील किसान कौशलेश शर्मा ने सिविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करने के बाद वर्ष 2015 में एक निजी कंपनी में साइट इंजीनियर के रूप में नौकरी शुरू की थी। लेकिन आत्मनिर्भर बनने और अपने गांव में कुछ अलग करने की चाह उन्हें वापस खेतों की ओर खींच लाई। वर्ष 2017 में उन्होंने नौकरी छोड़कर खेती-किसानी को अपनाने का साहसिक निर्णय लिया।

चार बीघा में हाइब्रिड फलों की खेती कौशलेश ने शुरुआत में केवल चार बीघा जमीन में हाइब्रिड फलों की खेती शुरू की। उन्होंने केवीके ग्वालियर से मार्गदर्शन लेकर दो बीघा जमीन में 200 हाइब्रिड अमरूद के पौधे लगाए। इसके बाद छत्तीसगढ़ की एक निजी नर्सरी से 250 थाई ग्रीन एप्पल (बेर) के हाइब्रिड पौधे लाकर ढाई बीघा क्षेत्र में रोपण किया।

फल व्यापारियों से सीधी डील कौशलेश बताते हैं कि थाई ग्रीन एप्पल के रसदार फल और मोटे छिलके वाली मीठी ऑर्गेनिक अमरूद की बाजार में अच्छी मांग है। गुणवत्ता बेहतर होने के कारण उन्हें उचित दाम भी मिलते हैं।

वे मुरैना और ग्वालियर के फल व्यापारियों से सीधी डील कर अमरूद 25 रुपए और बेर 30 रुपए प्रति किलो के भाव से बेचते हैं। इससे उन्हें लगभग साढ़े चार से पांच बीघा भूमि से सालाना 4 से 5 लाख रुपए की शुद्ध आय हो रही है, जो एक इंजीनियर के वेतन से कहीं अधिक है।

किसान ने अपने खेत में फलों का बाग लगाया है।
किसान ने अपने खेत में फलों का बाग लगाया है।

एक बार बाग लगाओ, 20 साल तक आमदनी कौशलेश का कहना है कि फलोद्यान खेती का सबसे बड़ा फायदा यह है कि एक बार बाग लगाने के बाद करीब 20 वर्षों तक लगातार आमदनी मिलती है, जबकि धान और गेहूं जैसी पारंपरिक फसलों में हर साल नई लागत लगानी पड़ती है।

वे गांव से गोबर खरीदकर खेत में ही जैविक खाद तैयार करते हैं और साल में एक बार पौधों को देते हैं। हाइब्रिड फसलों में कीट प्रकोप कम होता है, फिर भी जरूरत पड़ने पर वे गौमूत्र से बना पंचामृत छिड़काव करते हैं। फलों की खेती में रखवाली के अलावा कोई बड़ा अतिरिक्त खर्च नहीं आता।

एक बीघा में एक लाख रुपए की आमदनी शासन की फलोद्यान योजना के तहत कौशलेश को 1.44 लाख रुपए का अनुदान भी मिला, जिससे शुरुआती निवेश में मदद मिली। आज वे करीब पांच बीघा में बेर और अमरूद की ऑर्गेनिक खेती कर रहे हैं और प्रति बीघा लगभग एक लाख रुपए की आय अर्जित कर रहे हैं। आठ वर्षों की मेहनत के बाद वे न सिर्फ खुद आत्मनिर्भर बने हैं, बल्कि अपने गांव के 10 से 15 लोगों को स्थायी रोजगार भी उपलब्ध करा रहे हैं।